Positive Effect on Indian Society on Child Development

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सकारात्मक प्रभाव (Positive Effect)

Positive Effect on Indian Society on Child Development

बालक के सामाजिक स्तर का निर्धारण

विशिष्ट जाति, वर्ग या समूह में जन्म लेने के आधार पर ही बालक के सामाजिक स्तर का निर्धारण हो जाता है। बालक को इससे अनेक लाभ होते हैं। पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण सामाजिक स्तर प्राप्ति हेतु संघर्ष नहीं करना पड़ता। निश्चित पारिवारिक नियमों, मान्यताओं और परम्पराओं के आधार पर उसका पालन-पोषण होता है जो उसे व्यवस्थित, नियमित और सुखी जीवन प्रदान करने में सहयोग देते हैं।

‘स्व’ की भावना का विकास –

बालक में सर्वप्रथम ‘स्व’ की भावना का विकास समाज की मूलभूत इकाई परिवार में होता है। परिवार के सदस्यों एवं समाज नेताओं के सम्पर्क में आकर वह स्वयं को उनके मध्य प्रतिष्ठित करने का निरन्तर प्रयास करता है। इस प्रकार वह अपने अधिकारों और कर्तव्यों से परिचय प्राप्त करता है तथा पारिवारिक परम्परा के रूप में व्यावसायिक कुशलता और आर्थिक क्षमता का विकास करता है।

बालक के सर्वांगीण व्यक्तित्व पर प्रभाव –

बाल-व्यक्तित्व की संकल्पना में शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, संवेगात्मक आदि सभी प्रकार के विकास समाहित हो जाते हैं, भारतीय समाज ने बालक के प्रत्येक प्रकार के विकास को प्रभावित किया है जिसे निम्नांकित दृष्टि से प्रस्तुत किया जा सकता है-

  • बालक के शारीरिक विकास पर प्रभाव : –  भारतीय समाज में बालक के स्वस्थ, सुन्दर और सुडौल शरीर के महत्व को स्वीकार किया गया है, तदर्थ बालकों के शारीरिक विकास के लिए भारतीय समाज ने विद्यालयों में खेलकूद, स्काउटिंग, गर्लगाइडिंग, पी.ई.सी., एन.सी.सी. एवं व्यायामशालाओं, जलाशयों का प्रबन्ध किया है। बालकों के शारीरिक विकास हेतु केन्द्रीय सरकार की ओर से “राष्ट्रीय अनुशासन-योजना” भी चलाई गई है जिसके अन्तर्गत प्रत्येक विद्यालय में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त अध्यापक की नियुक्ति का प्रावधान है। अनेक उपयोजनाओं को संयुक्त कर “राष्ट्रीय सुदृढ़ छात्र संगठन’ की विस्तृत योजना भी बनाई गई है जो बड़ी उपयोगी सिद्ध हो रही है। विद्यालयों में प्रति वर्ष “युवक कल्याण” तथा “युवक उत्सवों” के आयोजन के पीछे भी शारीरिक विकास को प्रोत्साहित करने का लक्ष्य स्पष्ट है।
  • मानसिक विकास पर प्रभाव : –  भारतीय संविधान ने जाति, धर्म एवं लिंग आदि के भेदभावों से ऊपर उठकर समाज के प्रत्येक बालक एवं बालिका के लिए मानसिक दृष्टि से विकसित होने के लिए समान अवसरों की व्यवस्था की है। प्रारम्भिक शिक्षा अनिवार्य एवं निःशुल्क है, उच्च शिक्षा हेतु प्राविधिक, मैडिकल, इंजीनियरिंग तथा कृषि कॉलेज खुले हुए हैं जहाँ समाज का कोई भी बालक इच्छा और योग्यतानुसार प्रवेश ले सकता है।
  • संवेगात्मक विकास पर प्रभाव : –  भारतीय समाज में व्याप्त विघटनकारी प्रवृत्तियों जातीयता, प्रान्तीयता, साम्प्रदायिकता, भाषावाद से जहाँ राष्ट्रीय एकता खतरे में पड़ी हुई है वहाँ बालक के सांवेगिक विकास को स्वस्थ रूप प्रदान करने की ही दृष्टि से विद्यालयों का महत्वपूर्ण दायित्व है। भावात्मक एकता समिति तथा राष्ट्रीय एकता समिति की स्थापना के लक्ष्य की सम्पूर्ति समाज द्वारा स्थापित विद्यालयों के माध्यम से ही सम्भव है।
  • आध्यात्मिक विकास पर प्रभाव : –  आध्यात्मिक दृष्टि से बालक के व्यक्तित्व को एक निश्चित दिशा में विकसित करने के लिए विद्यालय अपने पाठ्यक्रमों में धर्म, दर्शन एवं नीतिशास्त्र जैसे विषयों का प्रावधान करते हैं, तत्सम्बन्धी विषयों पर सिम्पोजियम संगोष्ठी एवं कार्यशालाओं का आयोजन अप्रत्यक्ष रूप से बालक के आध्यात्मिक विकास को प्रभावित करता है।

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