Education Curriculum & Teaching Methods of Vedic Period In Hindi

Posted on

वैदिककालीन शिक्षा का पाठ्यक्रम (Education Curriculum of Vedic Period)

Education Curriculum & Teaching Methods of Vedic Period In Hindi

वैदिककालीन शिक्षा का पाठ्यक्रम मानव जीवन की आवश्यकताओं तथा उपयोगिताओं पर आधारित है। चारों वेदों की पाठ्यवस्तु को शिक्षा के पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया है। इनके अनुसार भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की विधाओं का समावेश किया जाता है।

ऋग्वेद : – यह सबसे प्राचीन वेद है तथा इसमें ज्ञान का अपार भण्डार है। इसमें ऋचाओं तथा मन्त्रों के रूप में तत्कालीन ज्ञान, विचारधारा, सभ्यता तथा धर्म सम्बन्धी ज्ञान मिलता है। इसमें उपासना, प्रार्थना तथा यज्ञ-कार्य प्रमुख हैं।

सामवेद : – यह संगीत के एक पाठ्यक्रम के समान है। इसका उपयोग यज्ञ तथा उपासना के समय किया जाता है। इसमें छन्द तथा काव्य को समझना आवश्यक होता है।

यजुर्वेद : –  यह कर्मकाण्ड की पाठ्यवस्तु से भरा पड़ा है। इसके अन्तर्गत भारतीय धार्मिक तथा लौकिक जीवन का बोध होता है। इसमें जीवन से सम्बन्धित ज्ञान को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता है।

अथर्ववेद :-  यह सबसे बाद का वेद है। इसमें घर से सम्बन्धित कला-कौशल, उद्योग, सुख-सम्पदा आदि से सम्बन्धित विषय सामग्री सम्मिलित है। इसके द्वारा पाठ्यक्रम में सांसारिक और भौतिक विषयों को शामिल किया गया है।

वेदों में सभी विषयों के ज्ञान को सम्मिलित किया गया है। इसलिए इनके पाठ्यक्रम के स्वरूप में अधिक विविधता पायी जाती है। अत: पाठ्यक्रम में सभी प्रकार के विषयों को सम्मिलित किया गया है, जिससे बालक के सर्वांगीण विकास में सहायता मिलती है।

वैदिककालीन शिक्षण विधियाँ (Teaching Methods of Vedic Period)

वैदिककालीन शिक्षण व्यवस्था में बालक को गुरु के पास रहना पड़ता था। वस्त्र, भोजन, अनुशासन तथा संयम आदि आदेशों का पालन करना बालक का प्रमुख कर्त्तव्य होता था। वेदों के अनुसार शिक्षण सम्बन्धी निम्नलिखित विधियाँ हैं-

(1) मौखिक विधि,
(2) विवेचन विधि,
(3) प्रवचन विधि,
(4) चिन्तन-मनन, ध्यान-धारण विधि,
(5) व्यावहारिक विधि,
(6) शास्त्रार्थ विधि, तथा
(7) स्वाध्याय विधि।

(1) मौखिक विधि इस विधि में छात्र वेद की ऋचाओं को मौखिक रूप से स्मरण करता था और उन्हें क्रमिक रूप में उच्चारण करके पढ़ता और धारण करता था।

(2) विवेचन विधि—इस विधि में गुरु शिष्यों को कुछ ज्ञान, कौशल, अनुदेशन, निर्देशन और प्रवचन छात्रों के समक्ष प्रस्तुत करते थे और उस ज्ञान सम्बन्धी प्रश्नोत्तर विधि से संश्लेषण तथा विश्लेषण करते थे।

(3) प्रवचन विधि—इस विधि में शिक्षक छात्रों को कुछ बतलाते थे। शिष्य उन्हें ध्यानपूर्वक सुनकर उनका चिन्तन-मनन करके स्मरण करते थे।

(4) चिन्तन-मनन, ध्यान-धारण विधि इसमें ब्रह्मा तथा आत्मा पर ध्यान केन्द्रित कराया जाता था, इसे केन्द्रीयकरण विधि भी कहते हैं। इसके आत्मचिन्तन, आत्मानुभूति, ध्यान-धारण मुख्य साधन थे।

(5) व्यावहारिक विधि—इसके अन्तर्गत दैनिक कर्तव्यों के प्रति जानकारी दी जाती थी, जिसमें यज्ञ, संध्या, उपासना तथा अन्य आवश्यक सामग्रियों को लाने का आदेश दिया जाता था। कला-कौशल, उद्योग, व्यवसाय की शिक्षा भी दी जाती थी।

(6) शास्त्रार्थ विधि—इसका उपयोग वेदों के प्रचार के लिए किया जाता था तथा दूसरा उपयोग उपाधि प्रदान करते समय किया जाता था। इसमें प्रश्नों के उत्तर द्वारा छात्र के ज्ञान का आकलन किया जाता था।

(7) स्वाध्याय विधि—इसके अन्तर्गत छात्र कुछ सीखने के लिए स्वाध्याय तथा उसका आत्मसात करते थे। छात्र जितना अधिक स्वाध्याय करते थे, उन्हें उतना ही ज्ञान प्राप्त होता था। वेदों में स्वाध्याय तथा आत्म-चिन्तन से ही वह वेदों का अध्ययन कर सकता था। इस विधि को शिक्षण की श्रेष्ठ विधि माना गया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *