Education Aims of Vedic Period [वैदिककालीन शिक्षा के उद्देश्य]

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वैदिककालीन शिक्षा के उद्देश्य (Education Aims of Vedic Period)

Education Aims of Vedic Period [वैदिककालीन शिक्षा के उद्देश्य]

(1) ज्ञान तथा अनुभव पर बल  : – शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान प्राप्ति था। संस्कृत में कहा गया है- ‘ज्ञानं मनुजस्य तृतीय नेत्रम्’। अर्थात् ज्ञान मनुष्य का तीसरा नेत्र है। ज्ञान मनुष्य को एक शक्ति तथा दृष्टि प्रदान करता है। प्राचीन काल में ज्ञान का अर्थ ब्रह्म ज्ञान तथा आत्मसाक्षात्कार था। उस समय ज्ञान की परीक्षा विद्वत परिषदों द्वारा ली जाती थी, उसके लिए छात्रों को शास्त्रार्थ करना पड़ता था। ब्रह्मज्ञान के द्वारा छात्रों का आध्यात्मिक और धार्मिक विकास किया जाता था।

(2) चित्तवृत्तियों का निरोध : – उस समय शिक्षा का उद्देश्य छात्रों की चित्तवृत्तियों का निरोध करना था, क्योंकि हमारा मन तथा इन्द्रियाँ बहुत चंचल हैं। ये मनुष्य को भौतिक सुखों की ओर ले जाती हैं। आध्यात्मिक विकास तथा आत्मा के विकास के लिए जप, तप और योग पर विशेष ध्यान दिया जाता था। इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने के बाद ही कोई व्यक्ति अध्यात्म में विकास कर सकता है। अत: छात्रों को यम-नियमों तथा आसनों द्वारा चित्तवृत्तियों का निरोध करने का प्रशिक्षण दिया जाता था ताकि उनका ध्यान इधर-उधर भटकने न पाये और वे मोक्ष प्राप्त करने की सामर्थ्य प्राप्त कर सकें। भारतीय धार्मिक ग्रन्थों में एक रूपक द्वारा शरीर की इन्द्रियों की व्याख्या की गयी है। उस रूपक के अनुसार शरीर एक रथ है, उस रथ पर सवार आत्मा एक रथी है, उस रथ पर नियन्त्रण रखने वाली बुद्धि सारथी है, मन लगाम और इन्द्रियाँ घोड़े हैं। मानव जीवन एक मार्ग है। जीवन का गन्तव्य मोक्ष है। भौतिक सुख मार्ग के आकर्षण हैं। इन्द्रियाँ भौतिक सुख की ओर आकर्षित हो जाती हैं। विवेक बुद्धि मोक्ष तक पहुँचने के लिए प्रयत्नशील है और मन इन्द्रियों को नियन्त्रित करता है। संस्कृत में कहा गया है, “इन्द्रियाणां प्रशमं शास्त्रम्” अर्थात् इन्द्रियों पर नियन्त्रण ही शिक्षा है। इस प्रकार इन्द्रिय निगृह द्वारा अपने अन्तिम लक्ष्य को प्राप्त करना शिक्षा का उद्देश्य था।

(3) चरित्र विकास : – प्राचीन शिक्षा का उद्देश्य चरित्र का निर्माण करना था। संस्कृत में कहा गया है, “शीलं परम भूषणम्” अर्थात् शील सबसे बड़ा भूषण है। चरित्रवान व्यक्ति ही अपना आध्यात्मिक विकास कर सकता है। सदाचरण से ही सद्गुणों का विकास होता है। करुणा, दया, प्रेम, उपकार, त्याग, परोपकार, सहयोग आदि गुण समाज में सुख शान्ति और समृद्धि ला सकते हैं। इसलिए शिक्षा के द्वारा इन गुणों का विकास किया जाता था। वैदिक काल में व्यक्ति के पांडित्य से ज्यादा चरित्र को महत्त्व दिया जाता था। मनुस्मृति में लिखा है, “केवल गायत्री मन्त्र का ज्ञान रखने वाला चरित्रवान ब्राह्मण सम्पूर्ण वेदों के ज्ञाता किन्तु चरित्रहीन विद्वान् से कहीं अधिक श्रेष्ठ है।” गुरुकुलों के पवित्र वातावरण, सदाचार के उपदेशों, गुरुओं के आदर्श चरित्र द्वारा छात्रों के चरित्र का निर्माण किया जाता था। डॉ. वेदमित्र के अनुसार, “छात्रों के चरित्र का निर्माण करना शिक्षा का अनिवार्य उद्देश्य माना जाता था।”

(4) व्यक्तित्व का विकास : – प्राचीन भारत में शिक्षा का एक उद्देश्य छात्रों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना था। यम, नियम, आसन तथा आत्म संयम के द्वारा शरीर को सुदृढ़ बनाना, शिक्षा का उद्देश्य था। छात्र प्रत्येक प्रकार की व्याधियों, रोगों से मुक्त होकर शक्तिशाली बने। अत: सूर्य नमस्कार तथा व्यायाम अनिवार्य था। शारीरिक विकास के साथ मानसिक तथा भावनात्मक विकास की ओर भी ध्यान दिया जाता था। इसलिए गोष्ठियों तथा वाद-विवाद सभाओं का आयोजन कर छात्रों में निष्पक्ष तथा न्याय, विवेक का पोषण किया जाता था। छात्रों की सुषुप्त शक्तियों का विकास कर उनका सर्वांगीण विकास किया जाता था। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जीवन के चार पुरुषार्थ माने जाते थे। इन्हें प्राप्त करना हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य था। जीवन का यही प्रेम और श्रेय था। आध्यात्मिक प्रगति में समन्वय स्थापित कर सन्तुलित व्यक्तित्व के युवक तैयार किये जाते थे।

(5) आध्यात्मिक तथा नैतिक विकास : – आध्यात्मिक विकास के लिए छात्रों में ईश्वर भक्ति और धार्मिकता की भावना भरी जाती थी। आध्यात्मिक विकास हमारी आन्तरिक अनुभूति पर आश्रित है। हम भावनाओं को उदात्त बनाकर अपना आध्यात्मिक विकास कर सकते हैं तथा नैतिक विकास हमारे आचरण पर आश्रित होता है। व्यक्ति के मन तथा आत्मा के विकास के द्वारा आत्मिक विकास हो सकता है। उस समय की शिक्षा का उद्देश्य था मुक्ति प्राप्त करना, “सा विद्या या विमुक्तये (उपनिषद)” । व्यक्ति को मुक्ति तब मिल सकती है जब वह ईश्वर भक्ति तथा भावना से सराबोर हो। व्रत, यज्ञ, उपासना तथा धार्मिक उत्सवों के माध्यम से छात्रों में इन भावनाओं को दृढ़ किया जाता था। डॉ. ए. एस. अल्तेकर के अनुसार, “सभी प्रकार की शिक्षा का प्रत्यक्ष उद्देश्य छात्र को समाज का आर्थिक सदस्य बनाया जाता था।”

(6) सामाजिक कुशलता का विकास : – प्राचीन भारत में शिक्षा का उद्देश्य था छात्रों की सामाजिक कुशलता में उन्नति करना। उस समय की शिक्षा केवल व्यक्ति का मानसिक विकास करने में ही सहायक नहीं होती, अपितु सामाजिक विकास भी करती थी ताकि छात्र अपने भावी जीवन में जीविकोपार्जन कर सके और अपना जीवन सुखमय बना सके। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए छात्रों को उनकी रुचि और वर्ण के अनुसार किसी व्यापार की शिक्षा अनिवार्य रूप से दी जाती थी।

(7) राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण : – प्राचीन भारत में शिक्षा का एक उद्देश्य राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण एवं प्रसार करना था। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रत्येक पिता अपने पुत्र को वंश परम्परागत व्यवसाय में कुशल बनाता था। प्रत्येक ब्राह्मण वेदों का अध्ययन करता था। क्षत्रिय-रक्षा, वैश्य-वाणिज्य तथा व्यापार और शूद्र सेवा का काम करता था। पैतृक ढंग से काम करने में राष्ट्रीय संस्कृति को सुरक्षित करने में सहायता मिलती थी। इस संस्कृति को शिक्षा के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित किया जाता था।

इस प्रकार प्राचीन भारतीय शिक्षा श्रेष्ठ मनुष्यों के निर्माण में सक्षम थी। प्राचीन भारतीय शिक्षा के कुछ तत्व आज भी हमारे लिए उपयोगी हैं, जैसे हम उच्चादर्शों तथा नैतिक मूल्यों को ले सकते हैं। व्यावसायिक शिक्षा का विशेष महत्त्व नहीं था और स्त्रियों को भी शिक्षा के कम अवसर उपलब्ध थे। इसके बावजूद प्राचीन शिक्षा हमारे जीवन में सुख-शान्ति प्रदान करने की शक्ति रखती है। अत: उस शिक्षा की उपयुक्तता वर्तमान में भी है।

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